
भगवा
आतंकवाद का मकरजाल फैलाया कांग्रेस ने
महाराष्ट्र के
नासिक जिले का माले गांव में ८ दिसंबर
२००६ को एक कब्रगाह में धमाका होता है। ३७ लोगों की जान चली जाती है। महाराष्ट्र
पुलिस के एंटी टेरोरिस्ट स्क्वाड की जांच में सीमी के कई आतंकवादी पकड़े जाते हैं। उनके नाम हैं नुरूल हुदा, शब्बीर अहमद , रइस
अहमद, सलमान फारसी, फारूख इकबाल, शेख मुहम्मद अली, आसिफ खान, मुहम्मद जायद, ।
यह वह वही दौर था जब देश में सीमी अर्थात स्टूडेंट
इसलामीक मूवमेट औफ इंडिया अपना पैर पसार रहा था। सरकारें
परेशान थी । शुरू में ३ महीने एटीएस की जांच चली । बाद में जांच सीबी आइ को सौप दी
गयी। वो जांच और तीन साल चली । सीबीआई ने
एटीएस की जांच को पुख्ता किया। कुछ और मुलजिम पकड़े गये । सीबीआइ के हाथ कुछ और
सबूत भी लगे। नारको टेस्ट किए गये। आर डी एक्स बरामद हुए। सीमी आतंकियों के
खिलाफ केस दाखिल किया गया। इन्हीं सबूतों के आधार पर उन आंतकवादियों की अर्जी कई
बार अदालत में खारिज हुयी। तात्कालिक
महाराष्ट्र के और केंद्रीय सरकारों (कांग्रेस) पर अल्पसंख्यकों के दवाब बढने
लगे। बोटबैंक की लालच में २०१० में तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने दिल्ली
में कहा कि इसके पीछे राइट विंग फंडामेंटलिस्ट का हाथ है। दिगविजय सिंह ने कहा कि
हिंदू धर्म वाले आतंकवादी पकडे गये हैं। वे संध के कार्यकर्ता रहे हैं।
२९ सितंबर २००८
महाराष्ट्र का नासिक जिला का यही माले गांव। एक और धमाके से दहल उठा । नूरजी मसजिद के पास भीड़भाड़ वाले इलाके में
दोपहर के वक्त धमाका होता है। ६ लोगों की जान जाती है। इसकी जांच फिर एटी एस के
पास आती है। इसके मुखिया थे हेमंत करकरे। करकरे की मौत उसी साल २६ नवंम्बर २००८ के
हमले में होती है। लेकिन २९ सितंबर २००८ से २६ दिसंबर २००८ के बीच एटीएस के जांच
में कांसपरेसी शुरू हो गयी ।
ऐसा कुछ हुआ कि
जिसने जांचकी पूरीदिशा बदल दी गयी । इसमें अब भगवा आतंकवाद का नाम लिया गया।
अभिनव भारत (लेफटीनेंट करनल श्रीकांत पुरोहित), जय बंदे मातरम
(साध्वी प्रज्ञा सिंहठाकुर), इन दोनो के सदस्य
भी अलग अलग थे। दयानंदपांडे (सुधाकर द्विवेदी) , प्रमोद
मुतालिक, । इन चारों को एटीएस ने मालेगांब धमाके का मासटर
माइंड करार दिया। इनके अलावा रिटायर्ड मेजर रमेशउपाध्याय , समीर कुलकरनी, सुधाकर
चतुरवेदी, अजय रहीरकर, राकेश धावरे, प्रवीन टकाले,
शिवनारायण, और श्याम साहू भी आरोपी बनाए गये।
इनके अलावा इस कहानी के और भी किरदार हैं।
यहीं से पहली वार देश में एक नयी थ्योरी का जन्म
हुआ। हिंदू आतंकवाद या सैफरोन टेरर। इस थ्योरी को और पुख्ता करने के लिए एक एक
करके कई आतंकी हमले इनमें जोड़े गये। १८ फरवरी २००७ का समझौता ब्लास्ट , १८ मई २००७ का मक्का मसजिद ब्लास्ट और ११ अक्टूवर २००७ का अजमेर ब्लास्ट
सबको भगवा आतंकवाद से जोड़ दिया गया।
पहले एटीएस जांच पर गौर कीजिए। हेमंत करकरे की
अगुआई में एटीएस ने जो कहानी बनायी उसके मुताबिक ११ और १२ अप्रैल को भोपाल में
अभिनव भारत का एक कारीक्रम हुआ। इसमें
हिंदु राष्ट्र पर चर्चा हुयी। मगर आज तक इस चर्चा का कोई सबूत एटीएस या दूसरी कोई
एजेंसी देश के सामने नहीं ला पायी। ये अदालत में चार्ज सीट का हिस्सा भी नहीं है। जांच एजेंसियों न कहा कि इनलोगों ने काम का
बटवारा किया था कि बम कोई और लाएगा। आदमियों का इंतजाम कोइ और करेगा। इसका भी कोई
सबूत अदालत में नहीं पेश किया गया।
इसी तफतीस में एटीएस ने साध्वी प्रज्ञा को अक्टूवर
में करनलपुरोहित और दयानंद पांडे को नावंबर में और बम एसेंबल करने के आरोप मे
प्रमोद मुतालिक को ३ साल के बाद एन आइ ए ने गिरफतार किया। एटीएस और एनआई ए की यह सरकारी कहानी भारत के बाहर उन गिरोहों
के माध्यम से पहुचायी गयी जो विदेशी चंदे से चलते हैं।

.jpg)
.jpg)










.jpg)

0 टिप्पणियाँ
Please do not enter any spam links in the comment box.