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| Kisan Andolan |
सूचना आ रही है। दिल्ली में किसी तरफ से आना मुश्किल हो गया है। हर जगह पंजाब के किसानों ने मोर्चा बंदी कर रखी है। ज्ञातव्य है कि यह पूरे देश के किसान का आंदोलन नहीं है। अनेक किसान संगठन और उनके नेता अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए इसमें शामिल होते जा रहे हैं। अब से पहले किसानो के नाम पर ऐसा कोई भी आंदोलन नहीं हुआ जिसमें एक ही राज्य की भागीदारी दिखे।
प्रकाश सिंह बादल का पुरस्कार वापसी की राजनीति
प्रकाश सिंह बादल ने अपना पुरस्कार वापस किया है। यह इनके राजनीति का हिस्सा है। उनको इसमें लाभ दिखाई पड़ता है। वे पंजाब में मंडियों के माफिया कहे जाते है। मंडियों से इन मंडीधीशों को सलाना १६०० कारोड़ रुपये प्राप्त होते हैं।
मगर इसमें कुछ दूसरे साहित्यकार पर भी दबाव है कि वे भी ऐसा करें। अगर तथाकथित किसानों की मांगों में दम होता तो उनको इस तरह अवार्डवापसी जैसे फर्जी काम करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इसमें कोई दम नहीं है। य फर्जी किसान हैं। यह फर्जी आंदोलन है। उनके साथ फर्जी लोग खड़े हैं।
आंदोलन के हाइजैक होने का डर
आंदोलनकारी अपने समर्थन में और भी सहयोगियों को बुला रहे हैं। वे एग्रेसिव हो रहे हैं। किसान नेता यह डर दिखा चुके हैं कि इसे कोई दूसरा हाईजैक न करने पावे। दरअसल यह आंदोलन हाईजैक हो चुका है। इसमें असामाजिक तत्व प्रवेश कर चुके हैं। इसमें खालिस्तानी आ चुके है। इसमें वामपंथी आ चुके है। इसमें आएसआइवाले आ चुके है। इसमें भीम और मीम वाले आ चुके है। इसमें खालिस्तानी आ चुके है। इसमें तथाकथित लिबरल आ चुके है।
कैप्टेन अमरेंदर उनके हितों को सुरक्षित नहीं रख सकती थी?
यह आंदोलन मात्र पंजाब के किसानो का है। यदि यह मान भी लें कि केंद्र सरकार उनका विरोधी है। वे उनके हितों की बात नहीं कर रहे हैं। क्या उनके हक और उनके हितों को कैप्टेन अमरेंदर की सरकार एड्रेस नहीं कर सकती थी, सुरक्षित नहीं रख सकती थी? और यह कानून पंजाब में लागू नहीं होता। पंजाब सरकार ने एक वियेयक पास करके इस कानून को पंजाब में लागू करने से खारिज कर दिया है।
फिर भी जगह जगह पर जमावरा बढा है। वे लोग दिल्ली और एनसीआर के लोगों की मुसीबत बढ़ा रहे हैं। दिल्ली आने जानेवाले रास्ते बंद हो रहे हैं। दर असल पंजाब के किसान अपने रास्ते बंद कर रहे हैं। देश के अन्य राज्यों के किसान उनकी बेवकूफी पर हंस रहे हैं।
केंद्र सरकार देश के सामन्य किसानो के साथ है
दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने मन बना लिया है कि वह देश के सामन्य किसानो के साथ है। वह इन तीन कृषि कानूनों को वापस नहीं लेने वाली है। सरकार ने कानून बनाने से पहले इसके विशेषज्ञों से बात की थी। उसने संबद्ध सभी पक्षों से बात की थी।
किसान युनियन के नेताओं को यह लग रहा है कि अब हम सरकार को दबाने की स्थिति में आ गये हैं। इसमें कोई दिक्कत नहीं है कि सरकार जनता के सामने दब जाय। जनता के हितों के लिए झुक जाय। लेकिन यदि समाज के बड़े हिस्से के लिए यदि कोई नियाम कानून बनाया गया तो उसपर सरकार को मजबूती से खड़ा रहना चाहिए। किसी के ब्लैकमेलिंग या दबाव में नहीं आना चाहिए। यह मजबूत सरकार का रवैया है। सरकार ने आज के बातचीत से यह संकेत दे दिए हैं।
उनको उम्मीद है कि वे आगे भी किसान को बंधक बनाए रखने में कामयाब हो जाएंगे
दूसरी तरफ किसान नेता लगातार कह रहे हैं और उस बात पर आस्वस्थ हैं कि हर हाल में इस कानून को वापस करवा कर रहेंगे। वे इसका इंतजाम कर लेंगे कि सामान्य किसानो को अधिकार न मिले। इसमें वे बड़े किसान, बड़े अढतिये, मंडी परिषद, मंडी की चारदीवारी, इन सबों की मदद लेंगे। वे आगे भी किसान को बंधक बनाए रखने में कामयाब हो जाएंगे।
वे कह रहे हैं कि हमारे पास एक वर्ष का राशन है। हम सड़क पर ही रहेंगे। इन कानूनो को वापस लेना होगा। हम इसमें किसी भी तरह का संशोधन नहीं चाहते हैं। हम कानून वापस से कम पर राजी नहीं हैं।
वेशर्मी की हद
इन आंदोलनकारियों ने दिल्ली एनसीआर के लोगों का जीना हराम कर दिया है और पजाब के कुछ गायक जैसे दिलजीत दोसांझ, गुरसबद सिंह कुलार, हर्फ चीमा, जैसे लोग सिंघू बोर्डर पर पहुंचे उनका मनोरंजन करने, उन्हे गाना सुनाने, उनको मनोबल बढाने। ये कितने गये जुगरे सोच के लोग हैं।

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