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| NN Vohra |
एनएन वोहरा समीति की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की लगातार मांग हो रही है। एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर 1993 में पेश की गई वोहरा कमेटी की रिपोर्ट पर ठोस कार्रवाई करने की मांग की है।
एनएन वोहरा समीति की रिपोर्ट राजनीति और प्रशासन के अपराधीकरण पर एक विशेष रिपोर्ट है। यह रिपोर्ट 1993 में भारत को तोड़ने वाले नापाक सांठगांठ को उजागर करता है। राजनीति और प्रशासन के अपराधीकरण पर यह एक महत्वपूण रिपोर्ट है। यह महाराष्ट्र सरकार और मुंबई के अपराध जगत के बीच के संबध को उजागर करता है।
१२ मार्च १९९३ में मुंबई में आतंकी हमले
१२ मार्च १९९३ में मुंबई में आतंकी हमले और धमाके हुए। मुंबई के १२ विभिन्न इलाकों में बम विष्फोट हुए। इस बम विष्फोट से ६ दिन पहले शरद पवार महाराष्ट्र चौथी बार मुख्य मंत्री बने थे। तब वे कांग्रेस के नेता थे। एन सी पी नहीं बनी थी। ये सभी विष्फोट हिंदु बहुल इलाके में हुए थे। इसमें २५७ लोग मरे थे। ७१३ लोग बम विष्फोट में धायल हुए थे।
१३ वें बम विष्फोट का झूठ
शरद पवार ने पुलिस पर यह दवाब बनाया कि विष्फोट वाले स्थानों में एक मस्जिद का नाम भी जोड़ लो ताकि शक की सुई मुस्लिम आंतकवादियों की ओर न जाय बल्कि लोगों का शक एलटीटीई पर हो। शरद पवार ने खुद यह बयान दिया है। शरद पवार ने बाद में यह स्वीकर किया कि इसके बाद हिंदु मुस्लिम दंगा हो सकता था और हम इसे टालना चाहते थे। इसलिए १३ वें बम विष्फोट को पुलिस रेकार्ड में शामिल करने के लिए हमने पुलिस पर दवाब बनाया। शरद पवार ने दाउद को देश छोड़कर भागने में मदद की। उन्होंने एयर स्पेस को मैनेज किया गया, जिससे दाउद भारत से बाहर भाग पाया।
बम विष्फोट में अंडरवर्ल्ड को सरकार का सहयोग
यह बारदात इतने सुसंगठित तरीके से हुई कि यह स्पष्ट हो गया कि राजनीति और प्रशासन के सहयोग के बिना यह बारदात नहीं हो सकती थी। केंद्र में नरसिंह राव की सरकार थी। इस दुर्घटना के बाद केंद्र की सरकार ने यह तय किया कि राजनीति और प्रशासन की अपराधियों के साथ गठजोड़ की जांच की जाय। यह स्पष्ट हो गया कि जबतक अपराधियों को राजनेताओं और प्रशासन का संरक्षण नहीं प्राप्त्ा होगा तब तक अपराधी इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकते हैं। मुंबई धमाके में दाउद इब्राहिम और मेमन बंधुओं का हाथ था। इन्हें सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं का समर्थन प्राप्त था।
अंडरवर्ल्ड और प्रशासनिक अधिकारियों से नेक्सस
ज्ञातब्य है कि १९८६ में सीबीआई ने भारत सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी थी। उसमें कहा गया था कि मुंबई के संगठित अपराध की दुनियां और मुंबई के प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं के बीच बड़े गहरे रिश्ते हैं। उस समय केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी। महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की सरकार थी। शरद पवार मुख्यमंत्री थे। केंद्र ने इस रिपोर्ट पर आगे कोई कार्रवाई नहीं की। मगर जब मार्च १९९३ में मुंबई में सिलसिलेवार बम विष्फोट हुए तो इस पर कार्रवाई करना आवश्यक हो गया।
एनएन वोहरा समीति का गठन
जब मुंबई धमाके हुए तो केंद्र में नरसिंह राव की सरकार थी। राजेश पायलट केंद्र में इनटरनल सेकुरिटी मिनिस्टर थे। केंद्र सरकार ने ९ जुलाई १९९३ को एक कमीटी का गठन किया। उस समीति के चेयरमैन बनाए गये तत्कालीन गृह सचिव एनएन वोहरा। एनएन वोहरा समिति में RAW के सेक्रेटरी, इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर, और साथ ही सीबीआई के डायरेक्टर और भारत सरकार के गृह मंत्रालय के इंटरनल सेक्युरिटी और पुलिस विभाग के स्पेशल सेक्रेटरी को शामिल किया गया। इस समीति ने जांच पूरी की। एनएन वोहरा समिति ने गृह मंत्रालय को 5 अक्टूबर 1993 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट गोपनीय अर्थत कांफिडेंसियल थी।
वोहरा समीति की फाइंडिंग्स
समिति ने अपनी रिपोर्ट में अनेक महत्वपूर्ण विंदुओं को प्रगट किया। समीति ने सर्वसम्मति से एक राय व्यक्त की थी कि 1993 के बम विस्फोटों के दौरान, मुंबई में आपराधिक नेटवर्क लगभग एक समानांतर सरकार चला रहा था।
समिति ने बताया कि क्रिमिनल गैंग और राजनेताओं और ब्यूरोक्रैटों के बीच एक नेक्सस बना हुआ है। यह सिंडिकेट छोटा नहीं है, बहुत बड़ा है। इसमें अघिकांश राजनेता शामिल हैं, जो चुनकर संसद में, विधान सभा में और स्थानीय निकायों में पहुचते रहते हैं। स्थानीय मीडिया भी इस गैंग में शामिल है। न्यायपालिका के कुछ सदस्य भी इस सिंडिकेट में शामिल हैं। नन स्टेट एक्टर्स भी इस सिंडिकेट के भाग हैं। क्रिमिनल गैंग्स, ड्रग रेकिटियर्स, स्मगलिंग ग्रुप्स, हथियारों के स्मगलर्स, सब इसमें शामिल हैं। यह संगठित अपराध का सिंडिकेट है। इन्होंने एक अंतर्राष्ट्रीय गठजोड़ भी तैयार कर लिया है।
एनएन वोहरा रिपोर्ट ने बताया इस सिंडिकेट ने एक अंतराष्ट्रीय नेक्सस भी तैयार कर लिया है। इसमें आइएसआइ जैसी इंटरनेशनल इंटेलिजेंस एजेंसिया भी शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मनी पावर अर्थात पैसा कमानेवाले और मसल पावर अर्थात बाहुबलियों के बीच एक गहरा रिश्ता बनाया जा चुका है।
रियल स्टेट सेक्टर का भी इनसे गहरा रिश्ता है। शहरों में लोगों की जमीन हड़पने के लिए या लोगों को डरा धमका कर सस्ती कीमत पर उनकी जमीन खरीदने के लिए रियल स्टेट के कारोबारी इस सिंडिकेट का उपयोग करते हैं।
वोहरा समीति ने यह भी पाया कि राजनेता और हमारे संवैधानिक ढांचे में इस सिंडिकेट को तोड़ने की इच्छाशक्ति नहीं है। इसी कारण ये नेक्सस मजबूत होता चला गया।
वोहरा समीति ने कहा कि इसकी जरों पर ठोस प्रहार करना होगा। इसमें समीति ने समस्या के साथ समाधान के उपाय भी सुझाए। इसमें न्याय को सरल बनाने की बात की गयी। पुलिस सुधार की बात की गयी। वोहरा समीति ने कहा कि गृह सचिव की अध्यक्षता में एक नोडल सेल बनाया जाय। उसको यह जिम्मेदारी दी जाय कि वह ऐसे सिंडिकेट के विरूद्ध निपटने की रणनीति बनाए। क्योकि इस सिंडिकेट को तोड़ना आसान काम नहीं है। इस नोडल को अन्य सभी एजेंसियां जैसे आइबी, रॉ, सीबीआई आदि सभी का सहयोग प्राप्त होना चाहिए ताकि यह प्रभावी तरीके से काम कर सके।
रिपोर्ट का हश्र
यह रिपोर्ट राजनेताओं, अपराधियों और सिविल सेवकों के खिलाफ ठोस सबूत हैं। 100 पृष्ठों में फैली रिपोर्ट का एक अधूरा संस्करण 1995 में संसद में पेश किया गया था। रिपोर्ट के केवल 1२ पृष्ठों को सार्वजनिक किया गया। इसके बांकी ८८ पन्नें को छुपाया गया। वह अभी भी नेपथ्य में हैं। आउटलुक पत्रिका के राजेश जोशी को गृह मंत्रालय का वह रिपोर्ट हाथ लगा जो उसने वाहरा कमीटी को जांच में सहयोग करने के लिए दिया था। १४ फरवरी १९९६ को आउटलुक पत्रिका में राजेश जोशी ने वह रिपोर्ट छाप दिया।
दाउद इब्राहिम से कांग्रेसी राजनेताओं के लिंक
उस रिपोर्ट में कुछ लोगों का जिक्र है। उसके अनुसार दाउद इब्राहिम से शरद पवार, सलीम जकारिया (मंत्री), जावेद खान(मंत्री) के लिंक थे। मुहम्मद दौसा (एक और सरगना) के मदन बाफना(मंत्री) से लिंक थे। पी राज कोली (माफिया) के साथ अरुण मेहता (गृह मंत्री) का लिंक था। हाजी अजमद (एक और सरगना) के बीबी पाटिल और जाबेद खान से लिंक थे। अरुण मेहता का सलीम जकारिया से लिंक थे। टाइगर मेनन का लिंक का लिंक जावेद खान से था। इस तरह अंडरवर्ल्ड सरगनाओं से महाराष्ट्र कैबिनेट के मंत्रियों के गहरे रिश्ते थे।
इसके अलावा इसमें तब के गुजरात के नेताओं के नाम आए जिनका इन माफिया सरगनाओं से लिंक पाए गये। गुजरात के माफिया सरगना अब्दुल लतीफ गुजरात के तब के मुख्यमंत्री चिमन भाइ पटेल से लिंक थे। रतिलाल देवा नायक के लिंक पीसीसी वायस प्रेसिडेंट कादिर पीर जादा से थे। इज्जू सेख हाजी के लिंक अहमद पटेल (एअइसीसी जेनरल सेक्रेटरी) से थे। अमर सुबानिया से तब के मुख्य मंत्री चिमन भाई पटेल के रिश्ते थे। कुल मिलाकर महाराष्ट्र, गुजरात और केंद्र के कांग्रेस सरकार के अंडरवर्ल्ड से गहरे लिंक थे।
ज्ञातव्य है कि पिछले 27 वर्षों में कोई अनुवर्ती कार्रवाई शुरू नहीं की गई है, जबकि वोहरा रिपोर्ट में अपराध सिंडिकेट के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के सुझाव के साथ एक नोडल सेल स्थापित करने की सिफारिश की थी। आज तक कोई नोडल सेल नहीं बना।
रिपोर्ट में कथित रूप से उल्लेख किया गया था कि कई कांग्रेस नेता, जो 1990 के दशक में महाराष्ट्र और गुजरात में प्रभावशाली पदों पर थे, ने अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और उसके गुर्गे इकबाल मिर्ची को इस आतंकी बारदात में सहयोग किया था।
इकबाल मिर्ची और प्रफुल्ल पटेल के लिंक
रिपोर्ट के जो 11 पृष्ठ जो 1995 में सार्वजनिक किए गए थे, उनमें केवल एक नाम था - इकबाल मिर्ची। मिर्ची ने अपराध से करोड़ों रुपये मूल्य की अचल संपत्ति अर्जित की। उसके कई बैंक खाते हैं। मिर्ची की संवृद्धि इस कारण हुयी कि संबंधित प्रवर्तन एजेंसियों ने समय पर उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की।
1995 में तत्कालीन राज्यसभा सांसद रहे दिनेश त्रिवेदी ने गृह मंत्री से पूरी रिपोर्ट जारी करने की मांग की थी जिसे अस्वीकार कर दिया गया। त्रिवेदी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। दस्तावेजों को जारी करने की मांग की थी। लेकिन सफल नहीं हुए थे। अदालत ने अपना निर्णय सुनाया कि रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए सरकार पर दवाब न बनाया जाय क्योंकि रिपोर्ट के सार्वजनिक होने का परिणाम सार्वजनिक न करने की तुलना में ज्यादा भयावह हो सकता है। अदालत ने कहा कि अगर इसे सार्वजनिक न किए जांय तो इसके परिणाम तुलनात्मक रूप से कम गंभीर होंगे।
माफिया तत्व नशीले पदार्थों, ड्रग्स और हथियार तस्करी
1993 के एनएन वोहरा की रिपोर्ट में कहा गया था कि कुछ माफिया तत्व नशीले पदार्थों, ड्रग्स और हथियार तस्करी में उतर गए हैं, जिससे भारत में नार्को-आतंकवाद नेटवर्क की स्थापना हुई है। बॉलीवुड के ड्रग वेब में अंतरराष्ट्रीय लिंक के सबूत मिले हैं। आखिरकार नार्को-आतंकवाद के लिए इन पैसों का इस्तेमाल किया गया था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव लड़ने के लिए राजनेता अंडरवर्ल्ड नेटवर्क पर निर्भर हैं। 1993 में मुंबई में हुए बम धमाकों और उसके बाद सूरत और अहमदाबाद में हुई सांप्रदायिक हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत में सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाने के लिए अंडरवर्ल्ड ने भारत में पाकिस्तान के आईएसआई नेटवर्क का इस्तेमाल किया था। रिपोर्ट में कहा गया है, बॉम्बे बम विस्फोट के मामलों की जांच में विभिन्न सरकारी एजेंसियों, राजनीतिक हलकों, व्यापार क्षेत्र और फिल्मी दुनिया में अंडरवर्ल्ड के व्यापक संबंध सामने आए हैं।
दाऊद, मेमन बंधु और बम विस्फोट
एनएन वोहरा ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र सत्ता के सहयोग से मेमन ब्रदर्स और दाऊद इब्राहिम की गतिविधियां बढ़ती गयीं, जिससे एक शक्तिशाली नेटवर्क की स्थापना हुई। इन तत्वों को संबंधित सरकारी विभागों के अधिकारियों, विशेष रूप से सीमा शुल्क, आयकर, पुलिस और अन्य लोगों द्वारा संरक्षित किया गया। खुफिया अधिकारियों का कहना है कि वोहरा की रिपोर्ट में प्रमुख राजनीतिक नेताओं के नाम हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के अधिकारियों के अनुसार, रिपोर्ट में प्रमुख राजनेताओं और नौकरशाहों के नाम शामिल हैं, जिन्होंने 1970 से 1993 तक दाऊद और मिर्ची की मदद की।
दाउद से शरद पवाद के घनिष्ट संबंध और पैसों का लेनदेन
दाउद से शरद पवार के घनिष्ट संबंध वर्ष १९७९ से थे। दिसंबर १९७९ से अक्टूबर १९९२ तक दाउद इब्राहिम गिरोह ने शरद पवार को ७२ करोड़ रुपये ट्रांसफर किया था। इसके अलावा कई अन्य कांग्रेसी लीडरों को भी दाउद ने काफी पैसे दिए थे। पैसों के लेन देन का विस्तृत जानकारी भी इसमें शामिल है। दिसंबर १९७९ से फरबरी १९८० के बीच मूलचंद चौकसी ने शरद पवार को७ करोड़ रूपये पे किया। इस धन को विदेश में रिसीब किया गया। मूल चंद चौकसी वही आदमी है जो दाउद का हवाला कारोबार चलाता था। चौकसी ने पूछताछ में यह कबूल किया था। १९९१ में चौकसी ने शरद पवार को ५ करोड़ रुपये दिए। यह रकम एक मिडिल ईस्ट देश से हवाला चैलेल के मार्फत शरद पवार को दिया गया। यह एलेक्शन पर्पस के लिए पे किया गया था। पप्पू कलानी ने दाउद की तरफ से शरद पवार को सितंबर १९९० में २० करोड़ रूपये दिए थे। यह गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में है। दूसरा ५० करोड़ का ट्रांसफर चौकसी द्वरा शरद पवार को दिया गया।
रिपोर्ट कहता है कि चौकसी मुंबई धमाके के चंद दिन पहले तक पवार के रेगुलर संपर्क मे था। बम ब्लस्ट के ठीक पहले अक्टूबर १९९२ को सीएम शरद पवार को १० करोड़ रुपए दिए गये। इससे ऐसा लगता है कि मुंबई बम ब्लास्ट में स्वयं महाराष्ट्र सरकार शामिल थी। यह रकम चौकसी ने शरद पवार के भतीजे को हस्तांतरित किया था। यह रकम मिडल ईस्ट से आया था। (गृह मंत्रालय की रिपोर्ट)। विष्फोट के पूर्व चौकसी ने २.५ करोड़ रूपये टाइगर मेनन को दिया था। धमाके में टाइगर मेनन की मुख्य भूमिका थी। बम धमाके का एक अपराधी उसमान गनी ने स्वीकार किया है कि इस बम धमाके में मुंबई का एक वड़ा फिल्म स्टार भी शामिल था। गनी ने जिस फिल्म अभिनेता को पैसा ट्रांसफर किया उसमें फिरोज खान, यूसूफ खान ( दिलिप कुमार) और एडवोकेट बैनर्जी का नाम भी शामिल है। इसमें जिसे पैसे दिये गये उसमें दिल्ली का एक शंभू दयाल शर्मा ऊर्फ गुप्ता जी का नाम भी है। जैन हवाला डायरी से इनका नाम बाहर आया है। यह शर्मा दाउद इब्राहिम के लिए काम करता था। वह एक दशक से पौलिटिशियनों को फंडिंग कर रहा था। उसने मई १९८५ में अरुण नेहरू को ३ करोड़ रुपये दिए थे। तब वे राजीव गांधी सरकार में इंटरनल सेकुरिटी मिरिस्टर थे।
चौकसी को टाडा एक्ट के तहत मई १९९३ में गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने उसे तत्काल बेल दे दिया। केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने एजेंसियों को चौकसी से पूछताछ नहीं करने दिया। अपने इनटेरोगेशन में चौकसी ने यह कबूल किया कि १९९० में कश्मीर से पंडितों को भगाने में भी जो फंडिंग की गयी उसमें भी दाउद और शार्मा की भूमिका थी। उसने यह भी स्वीकार किय कि दाउद का गुजरात के कोस्टल एरिया में जो स्मगलिंग का कारोबार था। उसमें उसे तात्कालिक मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल और एआइसीसी जेनेरल सेक्रेटरी अहमद पटेल मदद पहुचाते थे।
हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि पूर्व केंद्रीय उड्डयन मंत्री और राकांपा नेता प्रफुल्ल पटेल ने इकबाल मिर्ची की पत्नी, हाजरा मेमन के साथ वित्तीय लेन-देन में कथित तौर पर लिप्त होकर "देशद्रोह" में भाग लिया था।
संडे गार्जियन से बात करते हुए, आईबी के अधिकारियों ने कहा कि गृह मंत्रालय (एमएचए) को बहुत सी ऐसी जानकारी दी गई थी जो आईबी द्वारा एकत्र की गई थी, जिसे बाद में वोहरा समिति को दिया गया था। यह जानकारी, आईबी अधिकारियों के अनुसार, गुजरात और महाराष्ट्र के राजनेताओं से संबंधित है, जो अब भी राजनीति में बहुत सक्रिय हैं और अंडरवर्ल्ड माफिया के साथ उनके संबंध हैं।
दाऊद के पेरोल पर राजनेता नौकरों की तरह काम कर रहे थे
यह जानकारी स्पष्ट रूप से दिखाती है कि दाऊद के पेरोल पर राजनेता उनके नौकरों की तरह कैसे काम कर रहे थे। इस जानकारी का ज़्यादातर हिस्सा जो वोहरा समिति की रिपोर्ट में पेश किया गया था, उस हिस्से को तत्कालिक सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया गया था। लेकिन अब नरेंद्र मोदी की सरकार को इस तरह की कोई राजनीतिक मजबूरी नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि महाराष्ट्र के पूर्व सीएम और दाऊद इब्राहिम के बीच सांठगांठ का है।
उस समय के एजेंसियों द्वारा दिए गए खुफिया इनपुट में कहा गया था कि 1970 के दशक के अंत से दाऊद और महाराष्ट्र के एक बहुत बड़े नेता के बीच एक "निश्चित" सांठगांठ थी। संडे गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, शरद पवार को 1993 के धमाकों तक दाऊद से लगभग 70 करोड़ रुपये मिले थे।
एक अन्य इनपुट में खुलासा किया गया है कि कैसे दाऊद ने 1992 में शरद पवार के भतीजे को 5 करोड़ रुपये दो किश्तें दी थी, जो बाद में खुद राजनेता बन गया।
इकबाल मिर्ची का एनसीपी लिंक
प्रवर्तन निदेशालय ने पिछले साल यूपीए के नागरिक उड्डयन मंत्री, प्रफुल्ल पटेल और दाऊद के सहयोगी इकबाल मेमन के बीच संबंध स्थापित किए थे। NCP नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल के वित्तीय व्यवहारों को प्रमाणित करने वाले दस्तावेज और सबसे वांछित अपराधियों में से एक दाऊद इब्राहिम और उसके सहयोगियों के साथ सीधे संपर्क थे। प्रफुल्ल पटेल और उनकी पत्नी वर्षा पटेल के साथ संपत्ति के सौदे से जुड़े थे।
प्रवर्तन निदेशालय को प्रफुल्ल पटेल और दाऊद के सहयोगी मेमन के बीच इस तरह के संबंध के बारे में पता चला था। भारत और ब्रिटेन में मिर्ची के व्यापारिक उद्यमों और संपत्तियों पर नज़र रखते हुए, ED ने एक फर्म के साथ लिंक की खोज की जो प्रफुल्ल पटेल और उनकी पत्नी वर्षा पटेल से जुड़ी हुई है।
भारत और ब्रिटेन में स्थित मिर्ची की संपत्तियों की सूची के अनुसार, वर्ली के डॉ एनी बेसेंट रोड में एक 15-मंजिला इमारत, जिसका नाम 'सिजय हाउस' है, का निर्माण 2006 में मिर्ची और एम एस मिलेनियम डेवलपर्स लिमिटेड के बीच एक ज्वाइंट वेंचर के रूप में किया गया था। 2007 में, इमारत की तीसरी और चौथी मंजिलें मिर्ची के परिवार को मिलेनियम डेवलपर्स द्वारा दी गई थीं।
प्रफुल्ल पटेल और उनकी पत्नी वर्षा पटेल के पास मिलेनियम डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के शेयरों में साझीदारी है। दस्तावेजों में, CeeJay हाउस की 12 वीं मंजिल को प्रफुल्ल और वर्षा पटेल के पते के रूप में उल्लेख किया गया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल का परिवार भारत में एक बड़े तंबाकू समूह CeeJay समूह का मालिक है। एनएन वोहरा की रिपोर्ट के सार्वजनिक होने पर कई सरकारी एजेंसियां, राजनेता, फिल्मस्टार और आईएसआई के भेद खुलेंगे।
इंदिरा गांधी और करीम लाला की सांठगाठ
सूत्रों के हवाले से कुछ ऐसे सबूत सामने आए हैं को कांग्रेस और अंडरवर्ल्ड के संबंधो को उजागर करता है। शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत का एक बयान सामने आया है । वे कहते हैं कि एक समय था जब दउद इब्राहिम, छोटा सकील और शरद सेट्टी यह तय करते थे कि मुंबई का पुलिस कमिश्नर कौन होगा। और कौन कौन मंत्री बनेंगे। इंदिरा गांधी मुंबई आती थी तो खुद जाकर करीम लाला से मिलती थी। उन दोनो की रेगुलर मुलाकात होती थी।
ज्ञातव्य है कि करीम लाला, वरद राजन, और हाजी मस्तान, यूसुफ पटेल, राम प्रसाद ढोलकिया पूर्व के जमाने में मुंबई अंडरवर्ल्ड के डॉन हुआ करते थे। करीम लाला के पोते का बयान है कि करीम लाला का इंदिरा गांधी के साथ जो फोटो है वह उसके ऑफिस में कोई भी देख सकता है।


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