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किसान आंदोलन किस तरफ जाएगा?

Protest of Kisan Andolan to release terrorist from jails


भारतीय किसान यूनियन टिकरी बोर्डर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके हाथ में पचासो चित्र हैं। वो चित्र हैं बर्बर राव के, वो चित्र हैं गौतम नौलखा के, वो चित्र हैं उमर खालिद के, वो चित्र हैं सर्जिल इमाम के, वो चित्र हैं खालिद सैफी के।

देश को तोड़नेवालों के चित्र लेकर प्रदर्शन करने वाले आंदोलनकारी लोग खुद को किसान के प्रतिनिधि कहते दिख रहे हैं। इस आंदोलन को किसान आंदोलन कहते दिख रहे हैं। ऐसा वे स्‍थापित करना चाह रहे हैं।

मगर उनका रवैया ही उनके आंदोलन को ध्‍वस्‍त कर देता है। ध्‍वस्‍त हो गया उनका आंदोलन। ध्‍वस्‍त हो गयी उनकी सारी योजना।

सवाल है कि किसान मानेंगे नहीं तो क्‍या करेंगे? किसान मानेंगे नहीं तो वे अराजक होंगे, वे अराजकता फैलाएंगे। किसी भी अराजक होनेवाले आंदोलन की गति, दशा और‍ दिशा तय होती है। यह लम्‍बे समय तक नहीं चल सकता है।

अगर यह वास्‍तव में आंदोलन है तब तो यह अराजकता के साथ भी चल सकता है। मगर यह एक फर्जी आंदोलन है। यह दिशहीन हो चुका है। इसने दावा किया था कि यह किसान के हित के लिए आंदोलन है मगर अब ये लोग सरकार से इस आंदोलन में यह मांग कर रहे हैं कि आतंकवादियों  को जेल से रिहा करो। उनपर मुकदमा वापस लो। 


 

यह आंदोलन अपने मूल मुद्दे से भटक गया है, यह हाइजैक हो चुका है

लेकिन इस आंदोलन को करने वाले मूल रूप से भटके हुए लोग हैं। इनका किसानों के हित से कतई वास्‍ता नहीं है। इन आंदोलनकारियों के अराजकता के चेहरे सामने आ गये हैं और इसलिए इसकी रही सही साख भी चली गयी। इनका भारत बंद पूरी तरह विफल रहा।  देश भर से किसान इस आंदोलन को समर्थन देने को तैयार नहीं।

आंदोलन को कानून व्‍यवस्‍था की समस्‍या के रूप में सरकार निपटेगी

जैसे जैसे आंदोलन का अराजक चेहरा सामने आएगा, वैसे वैसे इस आंदोलन को कानून व्‍यवस्‍था की समस्‍या के तौर पर सरकार पिपटेगी।

जिस खालिद सैफी के ऊपर, जिस उमर खालिद के ऊपर उत्‍तर पूर्वी दिल्‍ली में दंगा करने का आरोप है और जो जेल में कैद है उसे छुराने के लिए यदि यह किसान आंदोलन किया जा रहा है तो यह कौन सा किसान आंदोलन है?

 

अगर यह भारत के किसानों का आंदोलन है तो उन किसानो को क्‍या जरूरत आ पड़ी कि वे इन राष्‍ट्र द्रोहियों को जेल से छुड़ाने के लिए यह आंदोलन करें। जो लोग एमएसपी के नाम पर आंदोलन कर रहे थे, वे मांग लेकर गये कि इन लोगों की रिहाई करा दीजिए।

यह पंजाब के बड़े किसानों का आंदोलन है। ऐसे दृष्‍टांट आ रहे हैं जिससे यह लग रहा है कि यह आंदोलन देश विरोधियों, आतंकवादियों, नक्‍सलियों, मायोवादियों, खालिस्‍तानियों के हाथ में चला गया है।  यह आंदोलन देश के फर्जी लिबरल, सेकुलर, ताकतों के हाथ में चला गया है। बर्बर बामपंथी हत्‍या की वकालत करता है। इसने कहा था कि सीआरपीएफ के जवान माआवादियों के क्षेत्र में गये क्‍यों? सर्जील इमाम ने कहा था कि भारत का चिकेन नेक काट देंगे। पूर्वोत्‍तर से जुड़नेवाले रास्‍ते को बंद कर देंगे। देश के ५०० शहरों में।

सर्जील इमाम, उमर खालिद, खालिद सैफी, बर्बर राव, गौतम नौलखा, आदि की तस्‍वीरें लगाकर आंदोलनकारी मांग कर रहे हैं कि इनकी रिहाई कर दो।

यह गुंडों का तरीका है कि वे किसी व्‍यक्ति को या समूह को बंधक बना कर दबाव बनाते हैं। सरकार पर दबाव बनाने के लिए सरससस इनलोगों ने दिल्‍ली की जनता को बंधक बना रखा है।

ये जा आंदोलन का अराजक चेहरा है, इस आंदोलन की नियति की तरफ जा रहा है। यह उसकी अंतिम परिणति की तरफ जा रहा है। 


 

४१ दिनों का एक कैपसुल कोर्स

इसमें बूढ़े, बच्‍चे और महिलाओं को लेकर वे आंदोलन में आ गये हैं। कहते हैं कि वे ६ महीनों की राशन लेकर आए हैं। कहते हैं कि उन्‍होंने ४१ दिनों का एक कैपसुल कोर्स तैयार किया है जिसके तहत वे घेराव करेंगे। धरना करेंगे। प्रदशर्न करेंगे। अराजकता करेंगे। और उनको उम्‍मीद है कि इसके बाद सरकार तो टूट ही जाएगी। 


 

कृषि कानून वापस नहीं होंगे

सरकार की तरफ से नरेंद्र सिंह तोमर और पीयूस गोयल ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर स्‍पष्‍ट तोर पर यह कहा है कि किसी भी स्थिति में कृषि कानून वापस नहीं होंगे।

प्रेस कांफ्रेस के दरम्‍यान तोमर साहब ने एक बात कही कि जो किसान पंजाब के अलग अलग हिस्‍सों से  चले आए दिल्‍ली, उसमें से कुछ बोर्डर पर आकर आंदोलन कर रहे हैं, कुछ निरंकारी संत समागम में बैठे हैं, कुछ दिल्‍ली के टिंगू सिकरी बोर्डर पर हैं, कुछ गाजीपुर चले गये। वे अराजक तत्‍व इतनी योजनावद्ध तरीके से हुआ कि एसी ट्रैक्‍टर ट्रॉली तक आ गयी।  

इसमें गौतम नौलखा, बर्बर राव, उमर खालिद, खालिद सैफी, सर्जिल इमाम जैसे लोगों को छोड़ने की वकालत की जा रही है।

जिन मासूम किसानों को यहां लाया गया उसे यह कह कर लाया गया कि हम आपको काले कानून से मुक्‍ति का मार्ग सु्गम करेंगे। वे आए। आंदोलन में जुड़ गये मगर वे तीन मुद्दे नहीं गिनवा सके जिन मुद्दों पर वे आंदोलन कर रहे हैं। वे लिखित में तीन मुद्दे नही दे पाए। अमित शाह के ९ तारीख के आमंत्रण को कूड़े मे डाल दिया।

 

आज प्रेस वार्ता के दौरान कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि जितने भी किसान नेताओं से उनकी बात हो रही है उसमें से किसी ने आज तक कोई प्रस्‍ताव नहीं दिया। 


 

आंदोलनकारियों का असल मकसद आंतकवादियों को जेल से छुड़ाना

दरअसल इन आंदोलनकारियों का असल मकसद  इन आंतकवादियों को जेल से छुड़ाना था। तो वे किसानो के हित वाले मुद्दे कहां से लिख कर लाते ?

वे लोग सरकार को कोई प्रस्‍तव नहीं दे पाए। सरकार ने खुद वे मुद्दे जो चर्चा में थे, उन मुद्दों को लेकर एक प्रस्‍ताव बनाया। और वह प्रस्‍ताव आंदोलनकारीयों को भेजा। या यम समझिए कि यह उन्‍होंने किसानो की आर में आंदोलनकरनेवालों को भेजा । आंदोलनकारी लिखित में कोई प्रस्‍ताव नहीं रख पाए। सरकार ने इन मिटिंगों में उनके सभी संकाओं का समाधान कर दिया है।

इस आंदोलन में पं‍जाब के वे बड़े किसान हैं जो पंजाब मे सिमित हैं, बड़े किसानों की वकालत करते हैं। वे कहते हैं कि हम देश के किसानों की बात कर रहे हैं। देश का किसान उनके साथ खड़ा नही होता। पूरे देश में भारत बंद असफल हो गया। उनके समर्थन में देश के किसी भी हिस्‍से से समर्थन नहीं आया।

लेकिन उनके समर्थन में कैनेडा, लंडन, आदि जगहों पर खालिस्‍तानी प्रदशर्न करने लगते हैं। फिरभी यह कहा जाता है कि इनको आप खालिस्‍तानी समर्थक मत कहिए। कोई दिक्‍कत नहीं।

 

उनकी मांग वो न थी जिससे किसानों की बेहतरी हो सके। उनकी मांग थी कि देश तोड़ने के आरोंपों में अलग अलग जेलों में बंद कैदियों को आप छोड़  दीजिए। क्‍या यह किसी किसान आंदोलन की मांग हो सकती है।

 

Protesters are getting out side support.

देश के ऐसे अराजक तत्‍वों का चेहरा सामने आना भी जरूरी है

किसान आंदोलन सुनकर लगता है कि यह एक भावनात्‍मक मुद्दा है। वेचारे ठंढ में पड़े हैं। उनका बहुत बुरा हाल होगा इस तरह बात होती है। लेकिन जब पता चलेगा कि ये जो तस्‍वीरें लहरा रहे हैं। वे आतंकवाद की देश विरोधी गतिविधियों में गिरफ्तार किए गये,  जेलों में बंद किए गये। उन सब को छुडाने के लिए यह आंदोलन किया जा रहा है, तो जनता की तरफ से आवाज आने लगेगी  कि यह लॉ एंड ऑर्डर का मामला है।

आज की यह तस्‍वीरें उन सभी प्रश्‍नों का उत्‍तर है। अब जो कुछ हो रह है वह कानून व्‍यवस्‍था का मामला है। देश का आम किसान इनके साथ नहीं है।

 

इस किसान आंदोलन को समझना है तो आप इस लतीफे से समझ सकते हैं। एक मल्‍टी स्‍टोरी बिल्‍डिंग बन रही थी। २० वें  फ्लोर पर कुछ मजदूर काम कर रहे थे। तभी एक मजदूर ने दूसरे मजदूर को आवाज लगायी कि अब्‍दुल तुम्‍हारी बेटी सलमा को ग्राउंड फ्लोर पर करेंट लग गया है।

 

उस दूसरे मजदूर ने सर से तसला फेका और नीचे सीढ़ी पर भागा। १६वें फ्लोर तक पहुचते पहुंचते उसे याद आया कि उसकी बेटी का नाम सलमा नहीं है। फिरभी वह नीचे भागता रहा। १२वें फ्लोर पर पहुंचते पहुंचते उसे याद आया कि उसकी तो कोई बेटी नहीं है। ८ वें फ्लोर तक पहुंचते पहुंचते उसे याद आया कि उसकी शादी तो हुयी ही नहीं है।  ४थे फ्लोर तक पहुंचते पहुंचते उसे याद आया कि उसका नाम अब्‍दुल नहीं है।

 

दिल्‍ली में जो किसान आंदोल हो रहा है उसका यही हाल है। आंदोलनकारी की मांग है कि नये किसान बिल को वापस लिया जाय। मगर पंजाब में अमरेंदर सिंह की सरकार ने विधान सभा में एक बिल पारित किया है कि यह बिल पंजाब में लागू नहीं होगा। मगर फिर भी ४ महीने का रसद लेकर आंदोलनकारी दिल्‍ली पहुच चुके हैं। दिल्‍ली पहुंचकर उन्‍हें पता चल गया कि वे तो किसान भी नहीं हैं। वे तो अढतिया हैं। वे तो विचौलिय और दलाल हैं। उनके साथ खरे लोग भी तो किसान नहीं हैं। वे खालिस्‍तानी हैं, भारत विरोधी हैं। कुछ पाकिस्‍तानी आइ एस आइ के एजेंट हैं। कुछ वामपंथी हैं जिनका कोई देश नहीं होता। कुछ साथ देने वाले ऐसे कांग्रेसी  लोग हैं जो जमानत पर रिहा है। उनको यह डर है कि यदि देश में सब ठीक चलता रहा तो उनका जेल जाना तय है।  कुछ मीम भीम गठबंधन के लोग हैं जिनको पंजाब के किसानो से कोई लेना देना नहीं है। कुछ आम आदमी पार्टी के लोग हैं जो बस अपनी रोटी सेकने के इंतजार में कब से खरे थे। कुल मिला कर बात यह है कि वह अब्‍दुल है ही नहीं, जिसकी बेटी को करेंट लग गया।

 

 

 

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