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स्वामीनाथन की सिफारिशे यदि पूरी तरह लागू हो जाएं तो हर किसान पैसे वाला होगा

 

MS Swaminathan

जब भी खेती, किसान का जिक्र आता है, किसान की आमदनी की बात होती है, देश में अनाज के बंपर उत्पादन की बात होती है, हरित क्रांति की बात चलती है एक शख्स का नाम जरुर आता है। वो हैं प्रो. एमएस स्वामीनाथन। प्रो. स्वामीनाथन को हरित क्रांति का जनक कहा जाता है, उन्होंने किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए जो सुझाव दिए थे, अगर वो पूरी तरह लागू हो जाएं तो किसानों की दशा बदल सकती है। बेशक मोदी सरकार ने उनमें से सभी सिफारिशों को लागू नहीं किया है। मगर उम्‍मीद है कि भविष्‍य में सभी की सभी सिफाशों को लागू कर दिया जाय।

 


प्रो. स्वामीनाथन कौन हैं ?

 

आज प्रो. स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925, कुम्भकोणम, तमिलनाडु में हुआ। एमएस स्वामीनाथन पौधों के जेनेटिक वैज्ञानिक हैं। स्वामीनाथन भारत की 'हरित क्रांति' में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका के लिए विख्यात हैं। उन्होंने 1966 में मैक्सिको के बीजों को पंजाब की घरेलू किस्मों के साथ मिश्रित करके उच्च उत्पादकता वाले गेहूं के संकर बीज विकसित किए थे। 'हरित क्रांति' कार्यक्रम के तहत ज़्यादा उपज देने वाले गेहूं और चावल के बीज ग़रीब किसानों के खेतों में लगाए गए थे।

 

हरित क्रांति ने भारत को आत्मनिर्भर बना दिया था

इस क्रांति ने भारत को दुनिया में खाद्यान्न की सर्वाधिक कमी वाले देश के कलंक से उबारकर 25 वर्ष से कम समय में आत्मनिर्भर बना दिया था।  भारत के कृषि पुनर्जागरण ने स्वामीनाथन को 'कृषि क्रांति आंदोलन' के वैज्ञानिक नेता के रूप में ख्याति दिलाई। उनके द्वारा सदाबाहर क्रांति की ओर उन्मुख अवलंबनीय कृषि की वकालत ने उन्हें अवलंबनीय खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में विश्व नेता का दर्जा दिलाया। एमएस स्वामीनाथन को 'विज्ञान एवं अभियांत्रिकी' के क्षेत्र में 'भारत सरकार' द्वारा सन 1967 में 'पद्म श्री', 1972 में 'पद्म भूषण' और 1989 में 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया था।

 





क्यों बना था स्वामीनाथन आयोग

 

अन्न की आपूर्ति को भरोसेमंद बनाने और किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर करने, इन दो मकसदों को लेकर 2004 में केंद्र सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स का गठन किया। इसे आम लोग स्वामीनाथन आयोग कहते हैं। इस आयोग ने अपनी पांच रिपोर्टें सौंपी। अंतिम व पांचवीं रिपोर्ट 4 अक्तूबर, 2006 में सौंपी गयी लेकिन इस रिपोर्ट में जो सिफारिशें हैं उन्हें तब तक लागू नहीं किया जा सका है, जबतक नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं आयी।

 

क्या हैं आयोग की सिफारिशें

इस रिपोर्ट में भूमि सुधारों की गति को बढ़ाने पर खास जोर दिया गया है। सरप्लस व बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांटना, आदिवासी क्षेत्रों में पशु चराने के हक यकीनी बनाना व राष्ट्रीय भूमि उपयोग सलाह सेवा सुधारों के विशेष अंग हैं।

 

किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए अयोग की सिफारिशें

किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए अयोग की सिफारिशों में किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, सेहत सुविधाएं बढ़ाने व वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है। एमएसपी औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की सिफारिश भी की गई है ताकि छोटे किसान भी मुकाबले में आएं, यही ध्येय खास है। किसानों की फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य कुछेक नकदी फसलों तक सीमित न रहें, इस लक्ष्य से ग्रामीण ज्ञान केंद्र व मार्केट दखल स्कीम भी लांच करने की सिफारिश रिपोर्ट में है।

 

सिंचाई के लिए सभी को पानी की सही मात्रा मिले

सिंचाई के लिए सभी को पानी की सही मात्रा मिले, इसके लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग व वाटर शेड परियोजनाओं को बढ़ावा देने की बात रिपोर्ट में वर्णित है। इस लक्ष्य से पंचवर्षीय योजनाओं में ज्यादा धन आवंटन की सिफारिश की गई है। फसली बीमा के लिए रिपोर्ट में बैंकिंग व आसान वित्तीय सुविधाओं को आम किसान तक पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया गया है। सस्ती दरों पर क्रॉप लोन मिले यानि ब्याज़ दर सीधे 4 प्रतिशत कम कर दी जाए। कर्ज उगाही में नरमी यानि जब तक किसान कर्ज़ चुकाने की स्थिति में न आ जाए तब तक उससे कर्ज़ न बसूला जाए। उन्हें प्राकृतिक आपदाओं में बचाने के लिए कृषि राहत फंड बनाया जाए।


खेती के लिए ढांचागत विकास
भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के साथ ही खेती के लिए ढांचागत विकास संबंधी भी रिपोर्ट में चर्चा है। मिट्टी की जांच व संरक्षण भी एजेंडे में है। इसके लिए मिट्टी के पोषण से जुड़ी कमियों को सुधारा जाए व मिट्टी की टेस्टिंग वाली लैबों का बड़ा नेटवर्क तैयार करना होगा और सड़क के ज़रिए जुड़ने के लिए सार्वजनिक निवेश को बढ़ाने पर जोर दिया जाए। खाद्य सुरक्षा के लिए प्रति व्यक्ति भोजन उपलब्धता बढ़े, इस मकसद से सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आमूल सुधारों पर बल दिया गया है।

कम्युनिटी फूड व वाटर बैंक

कम्युनिटी फूड व वाटर बैंक बनाने व राष्ट्रीय भोजन गारंटी कानून की संस्तुति भी रिपोर्ट में है। इसके साथ ही वैश्विक सार्वजनिक वितरण प्रणाली बनाई जाए जिसके लिए जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के 1% हिस्से की जरूरत होगी। महिला स्वयंसेवी ग्रुप्स की मदद से 'सामुदायिक खाना और पानी बैंक' स्थापित करने होंगे, जिनसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को खाना मिल सके। कुपोषण को दूर करने के लिए इसके अंतर्गत प्रयास किए जाएं।

 

जय हो नरेंद्र मोदी की जिसने इस दिशा में कदम तो उठाया। आशा है भविष्‍य में स्‍वामीनाथन के आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह लागू किया जाएगा।

 

 

किसान बिल के बारे में दुष्‍प्रचार

 

किसान के बारे में अनेक दुष्‍प्रचार किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि किसानो से जमीन ले ली जाएगी। मगर ऐसा कुछ नहीं है। किसानो से कोई जमीन नहीं ले रहा है। यह कहा जा रहा है कि एमएसपी खत्‍म कर दी जाएगी। मगर ऐसा भी नहीं है। एमएसपी का जो मौडेल है, उससे कोई छेड़छाड़ नहीं की गयी है।  यह कहा जा रहा है कि मंडी को खत्‍म कर दी जाएगी। मगर ऐसा भी नहीं है। मंडी को खत्‍म नहीं किया जा रहा है। जिसको मंडी में जाकर बेचना है, वह उसी तरह मंडी का शुल्‍क अदा करके मंडी में अपनी उपज बेच सकता है। संसद के सदन में गृह मंत्री यह कह चुके हैं।

तो फिर इस बिल में क्‍या है ? पहली बात यह है कि पुराने किसी भी प्रावधान को खत्‍म नहीं किया गया है। उसमें एक रत्‍ती भर भी छेड़छाड़ नहीं की गयी है।

 

फिर नये बिल में हुआ क्‍या? पुरानी व्‍यवस्‍था में एक अवरोध था कि आप मंडी के अंदर ही किसान अपना उत्‍पाद बेच सकते हैं। और मंडी के अढ़तिया और बिचौलिया उसका दाम तय करते थे। किसान उस तय मुल्‍य पर अपनी उपज बेचने को मजबूर था। यह एक जबरदस्‍ती का कानून था जो अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा था।

 

इस नये  बिल में यह प्रावधान कर दिया गया कि आपको जहां मन करता है, आप अपनी उपज वहां बेचें। आप अपने उत्‍पाद के मालिक हैं। आप अपने उत्‍पाद का मुल्‍य स्‍वयं तय कर सकते हैं। पहले एक काला कानून चल रहा था कि आप अपने सामान का न मुल्‍य तय कर सकते हैं न आप मंडी के बाहर उसे बेच सकते हैं। मंडी के ठेकेदार तय करते थे कि आपके उत्‍पाद का क्‍या मुल्‍य होगा। अब ऐसा नहीं होगा।

 

अब किसानो को मुक्‍त कर दिया गया कि आप अपने उत्‍पाद को जिसे चाहें उसके हाथों बेच सकते हैं। आपको जो सबसे अच्‍छा दाम देता है आप उसे बेचें। आप अपने बाजार में सीधे भी बेच सकते हैं। आप अंबानी और वाल मार्ट को बेच सकते हैं। आप मुक्‍त हैं।

 

कोई भी औद्योगिक उत्‍पाद है, उसका दाम तो उत्‍पादक तय करता है तो फिर किसानों को यह अधिकार क्‍यों नहीं। असल बात तो यह है कि ७० सालों से किसानों को यह हक ही नहीं था कि वह अपने उत्‍पाद का मुल्‍य निर्धारित कर सके। वह अपनी मर्जी से ग्राहक चुन सके। इस सरकार ने बस उस काले कानून को हटाया है। यह कानून तो ७० साल पहले ही बन जाना चाहिए था। तब नहीं बना। अब बना। मोदी साहब को धन्‍यवाद है। अब किसानो के पास औप्‍सन है। पहले नहीं था।

 

 

इस खेल को ठीक से समझने की जरूरत है

 

धान के पीछले मारकेटिंग सत्र २०१९-२० में एमएसपी पर  २६६.१९ लाख मिट्रिक टन धान सरकार ने खरीदी थी। अब ताजा हाल क्‍या रहा? कृषि सुधार कानून आये। क्‍या एमएसपी पर सरकारी खरीद खत्‍म हो गयी? क्‍या एम एस पी पर धान बेचना असंभव हो गया? क्‍या किसानों के हित पूरी तरह से दबा दिए गये? क्‍या सरकार ने कृषि का सारा कारोबार अडानी और अंबानी के हाथों बेच दिया। क्‍या यह सब गड़बर हो गया?  अब इसका जवाब खोजते हैं।

 

२०२०-२१ में अर्थात वर्तमान विपनन सत्र में ३१५.८७ लाख मिट्रिक टन धान की खरीद रेकार्ड  हुयी है। अर्थात एमसएपी पर धान की खरीद में १९ प्रतिशत की वृद्धि हुयी है।

 

पहले तो गेहूं और धान के अलावा एम एस पी पर कोई खरीद ही नहीं होती थी। अब तो देश के ज्‍यदातर राज्‍यों ने कई अन्‍य उपज को इसमें शामिल कर लिया है। अब तो लगभग सभी प्रकार के अनाज की एम एस पी पर सरकारी खरीद होती है।

 

ये जो वर्तमान विपनन सत्र में ३१५.८७ लाख मिट्रिक टन धान की खरीद रेकार्ड  हुयी है, इसमें से २०२.७२ लाख मिट्रिक टन ( अर्थात ६४ प्रतिशत) धान की खरीद अकेले पंजाब से हुयी है।

 

इसके बावजूद कौन सी ऐसी दिक्‍कत है कि ये आंदोलनकारी किसान कह रहे हैं कि हम शेष किसानों को यह समझा देंगे कि पूरा का पूरा कृषि कानून गलत है।

सरकार का रुख स्‍पष्‍ट है

सरकार का रुख स्‍पष्‍ट है। भारत किसानों का देश है। अगर किसानों की हालत ठीक नहीं रहेगी, तो देश में कुछ भी ठीक नहीं रहेगा। अगर किसानों के साथ अत्‍याचार होता रहेगा, तो इसका यह मतलब है कि देश के साथ अत्‍याचार हो रहा है। अगर हमारा किसान बुरे हाल में रहेगा, फिर दुनियां की कोई ताकत हमें समृ‍द्ध और संपन्‍न नहीं बना सकती है। इस सरकार ने इस ब्रह्म सत्‍य को समझा। पूर्व की सभी सरकारों ने किसान के हित की अनसूनी की सिवाय लाल बहादूर शास्‍त्री की सरकार। मगर यह हमार दुर्भाग्‍य है कि वे मात्र दो वर्ष हमारे प्रधान मंत्री रहे। उनके बाद फिर किसानों के हित में सोचने वाला प्रधान मंत्री भारत को २०१४ में मिला। 

 

किसान क्‍यों पीछे रहे

और क्‍यों हम पीछे रहें? इतना बड़ा बाजार होने के बावजूद हम ७० सालों में क्‍यों भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया? क्‍योंकि हम अपने किसानों को, अपने अन्‍नदाता को खुश नहीं रख पाए। हम किसानों को उसका हक नहीं दे पाए। इन्‍हीं सब वजहों से देश का किसान बर्बाद होता रहा। और देश की सरकारें उसे बर्बाद करती रही या कम से कम किसानों को बरबाद होते हुए मूक दर्शक की तरह देखती रही।  देश के किसानों को बर्बाद करने वाले तंत्र में सरकार समर्थित तत्‍व गेहूं में घुन की तरह घुस गयी। और ऐसी घुसी कि वो निकलने को तैयार नहीं हैं। आज किसान के नाम पर वही किसान विरोधी लोग आंदोलन कर रहे हैं।

 

अब, जब बहुत से किसानों को यह समझ में आ रहा है कि मोदी सरकार का यह प्रयास उन घुन को ठीक करने की कोशिश है तो उसके खि‍लाफ किस तरह का प्रोपेगैंडा पंजाब की सरकार, पंजाब की किसान युनियन कर रही है। उनका साथ दे रहे हैं राष्‍ट्र विरोधी ताकतें। जो कभी शाहीनवाग के साथ थे वे आज इन आंदोलनकरियों के साथ खड़े हैं।  

मनमोहन सरकार और मोदी सरकार की तुलना

 

वर्ष २००९ से २०१४ के पांच सालों में मनमोहन २ के  दौरान एमएसपी के अंतर्गत गेहूं की सरकारी कुल खरीद होती है १.५ लाख करोड़ रुपये की । जबकि २०१४ से २०१९ के दौरान अर्थात मोदी १ काल में दोगुनी अर्थान ३ लाख करोड़ हो जाती है। अर्थात सरकारी खरीद के  जरिए या तो दोगुनी किसानों को लाभ मिला या जितने किसानो को लाभ मिला उसकी रकम दोगुनी हो गयी ।

अगर हम यूपीए २ और मोदी १ में सरकारी खरीद की तुलना कर लें तो २ लाख करोड़ रुपए का धान २००९ से २०१४ तक खरीदा गया। वही २०१४ से २०१९ में  सरकारी खरीद ५ लाख करोड़ की हो गयी। अर्थात २.५ गुणा ज्‍यादा किसान लाभान्‍वित हुए यो किसानों को २.५ गुना ज्‍यादा लाभ मिला।

 

दालों के मामले में २००९ से २०१४ के दौरान भारत की अर्थशास्‍त्री मनमोहन सिंह सरकार ने ६५० करोड़ की दाल की खरीद की।  वहीं २००१४ से २०१९ के दौरान नरेंद्र मोदी सरकार ने ५० हजार करोड़ की दाल की खरीद हुयी। इन दोनो रकम में ८ गुणा का फर्क है। ये पैसा किसके पास गया। ये गया किसान की जेब में। और यह रकम किसानो के खाते में डायरेक्‍ट बैंक ट्रांसफर भी हुआ।

 

२००९ से २०१४ के दौरान हर सरकारी खरीद पर डायरेक्‍ट बैंक ट्रांसफर की स्‍थिति नहीं थी। जबकि नरेंद्र मोदी काल में सारा पैसा सीधे किसान के खाते में गया। 

मोदी सरकार से किसानो की आशा जगी है

अब जो केंद्र की सरकार है, उससे किसानो की आशा जगी है कि अब हमारे बच्चे भी किसानी करना चाहेंगे। ऐसी स्थिति में किसानों के नाम पर संगठन करनेवाले और राजनीति करने वाले लोग किसान का ही बुरा कर रहे हैं। मोदी सरकार चाहती है कि किसान खूब मजबूत हो। लोग कृषि की तरफ फिर से आकर्षित हो । किसान का बेटा शहर जाकर काम नहीं तलाशे।

 

अफवाह, भ्रम, फर्जीवारा का सहारा

 

ये आंदोलनकारी अफवाह, भ्रम, फर्जीवारा का सहारा लेकर सरकार को अस्‍थिर करना चाहते हैं। मगर सरकार ने और खुद नरेंद्र मोदी ने अपना रुख स्‍पष्‍ट कर रखा है। उन्‍होंने साफ साफ कहा कि हमने किसानो से बात करके कानून लागू किया। कृषि विशेषज्ञों से लगातार चर्चा करके ये सुधार किए और कानून बनाया। इसका किसानो को निश्‍चित लाभ मिलेगा। मोदी साहब अपनी बात पर कायम हैं। और कायम रहेंगे। इस कानून के वापस लेने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

 

किसानों से जुड़े हुए मुद्दों पर मोदी सरकार

 

किसानों से जुड़े हुए मुद्दों पर मोदी सरकार ने जितनी चर्चा की इतनी किसी पूर्व की सरकारों ने नहीं की। मोदी सरकार ने आज जो कदम उठाए हैं वह तो १९४७ में आजादी के ठीक बाद केंद्र की सरकार को उठानी चाहिए थी। मगर इन ७० सालों में किसानो की बेहतरी के लिए कुछ नहीं किया गया।

इससे पूर्व की सरकारों ने सबसीडी कम या ज्‍यादा करना, कर्ज माफी करना, आदि करते रहे जिससे किसानों की समस्‍या का कोई स्‍थाई नहीं हो सका।

 

किसानों की मूलभूत समस्‍या क्‍या है और उसका समाधान कैसे हो, उसके लिए इतनी चिंता मात्र इसी सरकार ने दिखाई।

 

नया कृषि बिल २०२०

अप्रैल ९ २००५ को दिल्‍ली में एग्रीकलचर सम्मिट हुआ था। तब के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने सम्मिट को संवोधित करते हुए कहा था कि सभी वस्‍तु एवं सेवाओं के लिए स्‍थानीय बाजारों को एकीकृत किए जाने के लिए उनकी सरकार प्रतिवद्ध है। कृषि उत्‍पादों के लिए हमें पूरे देश को सिंगल मारकेट बनाना है। हमे इसके आंतरिक नियंत्रण और बाधाओं को हटाना है।

मनमोहन सिंह ने बस घोषणा की और अपने १० वर्षों के कार्यकाल में इस दिशा में उन्‍होंने कुछ काम नहीं किया। मनमोहन सिंह की सारी उर्जा घोटाला करने और उन मामले को दबाने में लग गये। आज मोदी सरकार ने किसान की उन्‍नति की दिशा में काम कर के दिखा दिया। वे धन्‍यवाद के पात्र हैं। वे किसानो के लिए मसीहा हैं। देश भर के किसान मोदी सरकार के कामकाज से संतुष्‍ट हैं। 

ये विधेयक किसानो को बांधता नहीं है

ये विधेयक किसानो को बांधता नहीं है बल्कि उसे ज्‍यादा अवसर प्रदान करता है। इसमें व्‍यापारियों की भी हाणि नहीं है। अभी एक व्‍यापारी एक मंडी तक सिमित काम करता है। अब वह किसी भी मंडी के लिए काम कर सकता है। इससे लाइसेंस राज समाप्‍त हुआ है।

 

कृषि व्‍यापार और वाणिज्‍य विधेयक

नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में कृषि व्‍यापार और वाणिज्‍य विधेयक और कीमत आस्‍वासन दोनो लाए गये हैं। ये किसान के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाले हैं। किसान अब अपने उत्‍पाद का मूल्‍य स्‍वयं निर्धारित कर पाएगा। यह अब से पहले संभव नहीं था। यह किसानों की जीत है। 

 

पीएम किसान सहायता के माध्‍यम से सरकार किसानों को साल भर में ७५००० करोड़ रूपये देने जा रही है। सरकार अबतक डीवीडी के माध्‍यम से किसानों के खाते में ९२००० करोड़ रुपये जमा कर चुकी है।

 

१०००० नये एफपीओ

किसान को मजबूत बनाने के लिए सरकार ने १०००० नये एफपीओ बनाने की घोषणा की है। नरेंद्र मोदी जब कुछ वादा करते हैं तो उसे डेलीवर करते हैं। (जबकि मनमोहन सिंह डपोरशंख की तरह सिर्फ घोषणा करते थे और उस घोषणा पत्र को ठंढे वस्‍ते में डाल देते थे।) इस पर काम प्रारंभ हो गया है। ६८५० करोड़ रुपये एफपीओ को समर्थन देने के लिए खर्च किया जाएगा।

किसानों को ऋण की राशि में बढोतरी

पहले किसानों को अधिकतक  ८ लाख करोड़ रुपये  ऋण मिलता था। अब नरेंद्र मोदी सरकार ने तय किया कि किसानों को १५ लाख करोड़ रुपये का ऋण मिले।

अत्‍मनिर्भर पैकेज के तहत कृषि अवसर संरचना

कोविड के बाद अत्‍मनिर्भर पैकेज के तहत केंद्र सरकार ने कृषि अवसर संरचना के लिए १ लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की गयी। फिसरीज के‍ लिए २० हजार करोड़ रुपये, पशुपालन के‍ लिए १५ हजार करोड़ रुपये, हरवल खेती के‍ लिए ४ हजार करोड़ रुपये, फूड प्रोसेसिंग के‍ लिए १० हजार करोड़ रुपये, मधुमक्‍खी पालन के‍ लिए ५०० करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

 

८ जुलाई २०२० को कृषि अवसर संरचना की मंजूरी मंत्रि परिषद से हुयी। एक महीने के अंदर  सहकारी समितियों को इस पैकेज के अंतर्गत ११२८ करोड़ रुपये का ऋण दे दिया गया। आज यह बढकर लगभग १५०० करोड़ रुपये हो गया है।

 

पांच बर्षों में लगातार यह कोशिश हो रही है  कि बुआइ का रकवा बढे, जैबिक खेती का रकवा बढे, उत्‍पादन बढे, उत्‍पदकता बढे, उपार्जन बढे। इसमें लगातार सरकार काम कर रही है और सफलता मिल रही है।

किसानों के हित में रिफौर्म

किसानों के हित में यह जो रिफौर्म हो रहा है, उसमें किसानों का फायदा है। भ्रष्‍टाचार पर इससे नियंत्रण लगेगा। किसान पूरे देश में स्‍वतंत्रतापूर्वक देश में कहीं भी अपना उत्‍पाद बेच सकेगा। व्‍यापारी भी देश भर में कहीं भी व्‍यापार करने के लए आजाद होंगे।

 

यह बिल किसानों के हित में है, फिर किसान का विरोध क्‍यों?

 

पंजाब की एक खबर है २०१७ की । पंजाब की मंडियों में किसानों से २५ पैसे प्रति किलो आलू खरीदा गया। जबकि किसानों की लागत प्रति किलो दो रूपये से ऊपर बनती है। लेकिन किसानों ने कोई प्रोटेस्‍ट नहीं किया। इसी साल अप्रैल के महीने की खबर है कि पंजाब की मंडियों में सिमला मिर्च इतनी सस्‍ती बिक रही थी कि किसानों ने उन्‍हें अपने गाय बकरी को खिला दिया। किसान अपने फसलों की लागत नहीं ले पा रहा है। इसके बावजूद किसान सड़कों पर नहीं आया फिर अभी कौन है जो किसान के नाम पर आंदोलन कर रहे हैं ?

 

जब आप औरगेनाइज्‍ड प्रोटेस्‍ट करते हैं तो आपको भीड़ चाहिए होता है। फिर आपको उसे खिलाना पड़ेगा। फिर उनके परिवहन का खर्चा आएगा। इन सब चीजों के लिए लाखों करोड़ो रूपए की जरूरत पड़ेगी। आम किसानो के पास तो इनते पैसे होते नहीं हैं।

 

ऐसे कामों में आप कानून तोड़ते हैं। फिर आपको मुकदमा लड़ना पड़ सकता है। उसमें वकीलों पर लंबा चौरा खर्च आता है। किसानों के पास इसके लिए पैसे तो होते नहीं। इसीलिए वे प्रोटेस्‍ट करते नहीं हैं। आम आदमी का यह प्रोटेस्‍ट है ही नहीं। हर बड़ा प्रोटेस्‍ट स्‍पोंसर्ड होता है। यह भी है।

यह विरोध पंजाब और हरियाना में ही क्‍यों हो रहा है?

यह विरोध पंजाब और हरियाना में ही क्‍यों हो रहा है? किसान तो सबसे ज्‍यादा यूपी में हैं, एमपी में हैं, बिहार में हैं, आंध्रा प्रदेश में हैं, कर्नाटक में हैं,  तमिल नाडु में हैं, उड़ीसा में हैं, असम में हैं, राजस्‍थान में हैं, गुजरात में हैं, महाराष्‍ट्र में हैं, इत्‍यादि। उनको क्‍यों तकलीफ नहीं है। पंजाब और हरियाना में तो किसानों की आवादी कम है। इनको क्‍या तकलीफ है?

 

जब हमारा देश आजाद हुआ था तो हमारे पास सिंचाई की सुविधा नहीं थी । डैम नहीं बने थे। कैनाल नहीं बने थे। हरित क्रांति की शुरुआत पंजाब से हुयी थी। उस समय हरियाना भी अलग राज्‍य नहीं था। पंजाब में पानी भरपूर मात्रा में उपलब्‍ध था। पीडीएस और फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया ने अनाजों के भंडारण के लिए यही पर अधिकांश गोदाम बना दिए। अनाजों का सारा प्रक्‍योरमेंट पंजाब से होने लगा।

 

हालिया २०१८-१९ के डाटा को देखें तो पंजाब ने १२.८ मिलियन टन चावल पैदा किया। इसमें से ११.४ मिलियन टन चावल एफसीआइ ने खरीद लिया। अकेले पंजाब से ९० प्रतिशत चावल खरीदा जा रहा है। हरियाना ने ४.५ मिलियन टन चावल पैदा किया और केंद्र सरकार ने उसका ८५ प्रतिशत खरीद लिया। हमारे अनाज का प्रोक्‍योरमेंट का ८० से ८५ प्रतिशत दो राज्‍यों से होता है।

 

उस समय दूसरे राज्‍यों से प्रोक्‍योरमेंट में कुछ मुश्‍किलात थे मगर बाद में तो स्थिति सुधर गयी। अन्‍य राज्‍यों में भी खेती बारी अच्‍छी होने लगी है। वहां से भी प्रोक्‍योरमेंट किया जा सकता है।

मोदी से पहले की सरकारें किसानों की दुर्दशा पर ध्‍यान ही नहीं दे सकी

मोदी से पहले की सरकारें बोटबैंक की राजनीति में इस तरह फंसी रही कि वह किसानों की दुर्दशा पर ध्‍यान ही नहीं दे सकी। देश के अन्‍य भागों के किसानों ने यह मांग भी नहीं की कि हमसे भी अनाज खरीदी जाय। उसने इसका विरोध भी कभी नहीं किया कि सारा अनाज पंजाब और हरियाना से ही क्‍यों खरीदी जा रही है? इसलिए यही ट्रेंड बन गया। पंजाब की मंडियों से बहुत लेन देन होते हैं। इसमें बिचौलियों की खूब कमाई होती है। इससे पोलिटिसियन भी जुड़े हुए हैं । उनकी भी खूब कमाई होती है। मगर किसान गरीब का गरीब रह जाता है।

 

किसानों की हालत कैसे सुधरे इस पर पहली बार अटल बिहारी बाजपेयी ने चिंता प्रकट की। उन्‍होंने वर्ष २००४ में श्री स्‍वामीनाथ की अध्‍यक्षता में एक आयोग का गठन किया। आयोग को जिम्‍मा दिया गया कि किसानो की हालत सुधार के लिए उपाय तलाशे जांय। स्‍वामीनाथन ने २००६ में अपना रिपोर्ट सरकार को सौंप दिया। तब मनमोहन सिंह‍ देश के प्रधान मंत्री थे। उन्‍होंने इस विषय पर सेमिनारों में अच्‍छा भाषण दिया मगर उन सुझावों पर कोई अमल नहीं किया जो स्‍वामीनाथन कमीटी ने दिए थे।

मोदी सरकार ने उन सिफारिसों को लागू किया

एक बार प्रधान मंत्री चंद्रशेखर ने कहा था कि किसान की दशा को सुधारना कोई बड़ी समस्‍या नहीं है मगर सरकारें यह इसलिए नहीं करना चाहती है कि सरकारों को इसमें फायदा है कि किसान गरीब रहे। नहीं तो उसकी जी हूजूरी खत्‍म हो जाएगी। मोदी सरकार लाल बहादुर शास्‍त्री सरकार के बाद दूसरी सरकार है जिसने किसानों की सुध ली।

मोदी सरकार ने उन सिफारिसों को लागू किया और उनकी अनुसंसा के हिसाब से कानून बनाया। नया कानून ने किसानो को यह छूट दे दी कि आप की जहां मर्जी हो बेचें। वह सीधे सीधे कंपनियों को बेच सकता है। प्राइवेट खरीदारों को बेच सकता है। वह अब मंडियों का मोहताज नहीं रहा।

 

अब पंजाब से प्रोक्‍यारमेंट कम हो जाएगा। मंडियों से जुरे बिचोलिए का और राजनीतिज्ञों का भारी नुकसान हो सकता है। इसीलिए वे तिलमिलाए हुए हैं। इसी लिए यह प्रोटेस्‍ट हो रहा है।

 

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