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| Narendra Tomar Union Agriculture Minister |
भारत में खेती किसानी एक क्राइसिस की दौर से गुजर रही है। १०१६ का इकोनोमिक सर्वे कहता है कि देश के १७ राज्यों में एक किसान परिवार की औसत सलाना आय २०००० रूपए है अर्थात हर महीने १७०० रुपए। १७०० रुपए से एक गाय नहीं पाला जा सकता। कैसे एक किसान परिवार महीने में इस रकम से गुजारा करता है, आप सोच सकते हैं।
आजादी के बाद से किसान के साथ लगातर अन्याय होता आ रहा है। कोई भी सरकार किसान की परवाह नहीं करती रही है। नरेंद्र मोदी लाल बहादुर शास्त्री के बाद दूसरे प्रधान मंत्री हैं जिसने किसानों की समस्या का संज्ञान लिया। जिसने उसकी सुध ली।
मिनिमम सपोर्ट प्राइस है वाजिब से ५० प्रतिशत कम
आज किसानों को जो मिनिमम सपोर्ट प्राइस मिल रहा है वह वाजिब से ४० से ५० प्रतिशत कम है। यह आज से नहीं हो रहा है। यह तो पंडित जवाहरलाल नेहरू के जमाने से हो रहा है।
कृषि उत्पाद का दाम उस अनुपात में नहीं बढा जिस अनुपात में गैर कृषि उत्पाद का या सेवा का दाम बढ़ा। यह लगभग सभी फसलों के साथ हुआ है।
१९७० में गेहूं का दाम ७६ रूपए प्रति क्विंटल था। ४५ साल बाद २०१५ मे १४५० रूपए प्रति क्विंटल हो गया। किसान के उत्पाद के दाम में औसतन १९ गुना की वृद्धि हुयी है।
उसी दौरान सरकारी मुलाजिम का पेमेंट १२० से १५० गुना बढ़ गया। स्कूल टीचर की तनखा २८० से ३२० गुना बढ़ी है। युनिवरसिटी के प्रोफसरों की तनखा १५० से १७० गुना बढी है।
सौ गुना भी किसान के प्रोडक्ट का दाम बढता तो गेहूं की कीमत ७६०० रूपए प्रति क्विंटल बनता है।
किसान खेती छोड़ रहा है
भारत के किसानों को जान बूझ कर उसके हक से मुस्तहक रखा गया है। आजादी से आज तक यही होता आ रहा है। इनफ्लेशन को नियंत्रित करने के लिए सारा बोझ किसानों के कंधों पर डाला गया है। किसान मर रहा है। किसान खेती छोड़ रहा है।
भारतीय किसान राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर षडयंत्र का शिकार
भारतीय किसान राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर षडयंत्र का शिकार हुआ। वे मिलकर यह कहते रहे हैं कि यदि आप कृषि को कम करेंगे तभी आर्थिक रिफौर्म वायेबल हो सकते हैं। इकोनोमिक रिफौर्म में सस्ता प्रोड्यूस चाहिए। आएगा कहां से, तो कृषि से। सस्ता दिहारी मजदूर चाहिए और वे कहां से आएंगे तो कृषि से आएंगे।
कृषि को अनइकोनोमिकल मॉडल बनाया गया
पूर्व की सरकारों ने विचारपूर्वक कृषि को अनइकोनोमिकल मॉडल बना कर छोड़ दिया है। ताकि लोग खेती से बाहर आए। कॉरपोरेट्स को सस्ता रॉ मेटेरियल भी मिले और सस्ता मजदूर भी मिले।
इनफ्लेशन न बढ़े, इसके लिए रास्ता निकाला गया
इनफ्लेशन बढती हैं तो सरकारें गिरती है। इनफ्लेशन न बढ़े, इसके लिए रास्ता निकाला गया कि किसानों को उसके उत्पाद का कम दाम दिया जाय। इसीलिए किसानों पर बोझ डाला जाता रहा। औरगेनाइजेशन ऑफ इकोनोमिक कोओपरेशन एंड डिवलपमेंट (ओइसीडी) की रिपोर्ट कहती है कि चार दशकों से किसान की इनकम नहीं बढी।
किसान की बातें करनेवाला तो है उसको खिलानेवाला नहीं है। उसको रेट देनेवाला कोई नहीं है। उसे उसका हक नहीं मिलता है।
दो से तीन एकड़ वाला किसान
देश में ८५ फीसदी किसान दो से तीन एकड़ वाले किसान हैं। उनकी जिबिका दूध से होती है।
स्वामीनाथन कमीशन कहता है कि लागत का डेढ गुना दाम दो। कंप्रेहेंसिव कॉस्ट या सीटू के हिसाब से। । फैमिली लेबर और जमीन का किराया भी जोरो। डेप्रेसिएशन भी जोरो। १५ अगस्त २००७ को स्वामिनाथन कमीटी की रिकोमेंडेशंस सरकार को मिल गयी। मनमोहन सिंह प्रधान मंत्री थे। बाद में सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी जी कि सरकार ने इस दिशा में काम किया।
आधुनिक इकोनोमिक डेजायनचल रहा है
मॉडर्न इकोनोमिक डेजायन यह कहता है कि एग्रीकल्चर को खत्म करना है। इसी से इकोनोमी आगे जाएगी। अमेंरिका में किसान खत्म हो चुके हैं। वे आवादी में २ फीसदी हैं। यूरोप में हर मिनट एक किसान खेती छोड़कर जा रहा है।
किसान सारी दुनियां में परेशान है। इसलिए अनेक देशों की सरकार ने किसानों को अर्थिक सुरक्षा दी। मगर भारत में ।
रघुराम राजन कहते थे कि सबसे बड़ा रिफोर्म भारत में तब होगा जब हम लोगों को खेती से निकाल कर शहर में लाएंगे। क्योकि शहर में दिहारी मजदूर की जरूरत है। यह हमारे इकोनोमिक पोलिसी का डेजायन है। अभी ५७ प्रतिशत लोग खेती करते हैं । आगे ५६ और १५ हो ऐसी रणनीति । किसानों को खेती से बेदखल करना सरकार की नीति रही है। यह बदला है २०१४ में।
किसान को एडुकेशन या हेल्थ रेंट या मेडिकल एलावेंस नहीं मिलता है
किसान अपने ही देश में हासिए पर हैं। वे अपने देश के सबसे कम सुबिधा पानेवाली एक वर्ग है। किसान को एडुकेशन या हेल्थ रेंट या मेडिकल एलावेंस नहीं मिलता है। क्या वे हकदार नहीं हैं ?
सुपरीम कोर्ट के अफसरों को २१ हजार रुपए कपड़ा धोने के लिए मिलता है। डिफेंस वालों को २० हजार रुपए कपड़ा धोने के लिए मिलता है। सरकार में जो हैं उनको १०८ प्रकार के एलाउएंस भी मिलते है। किसानो को क्या मिलता है। वह तो इस पूरे सिस्टम का विक्टिम है।
किसानों को निचोर कर हमारी अर्थव्यवस्था चलती है
आजादी से पहले अंग्रेज देश चलाते थे। वे किसानों को लूटते थे, यह समझ में आता है, मगर आजादी के बाद भी सत्ता में जो लोग आए, उन्होंने किसान हित में अपनी नितियां नहीं बनायीं। पूर्व में सत्ता सुख लेने की राजनीति चलती रही। यह नेहरू युग से ही शुरू हो गया। यदि लाल बहादुर शास्त्री जी को छोड़ दें तो सरदार मनमोहन सिंह के काल तक यह चला।
फिर किसान की सुध लेने वाला २०१४ में राष्ट्रीय राजनैतिक पटल पर बतौर प्रधान मंत्री आया वो बंदा था नरेंद्र मोदी फकीर। मोदी साहब पहले प्रधान मंत्रीं हैं जिंहोंने किसान के लिए जो हो सकता था किया। किसानों को यह दिखाई पड़ रहा है।
आज तक राजनैतिक पार्टियों ने संयुक्त रूप से किसान को संगठित नहीं होने दिया। उन्हें बांटा। किसान एक शक्ति नहीं बन पाते क्योंकि वे जाति और धर्म में बटे हैं।
आज नरेंद्र मादी के नेतृत्व में जो सरकार देश में चल रही है, उसके विरोध में दिल्ली में किसान आंदोलन हो रहा है। इसने लोगों से भारत बंद का अह्वान किया। यह देश भर में पूरी तरह असफल रहा। देश भर में लगभग कहीं भी बंद का असर नहीं दिखा।
इस देशवंदी ने एक बात स्पष्ट कर दिया कि देंश के प्रधान मंत्री के साथ कितने लोग हैं और आंदोलनकारियों के पक्ष में कितने लोग हैं। आज सारा देश हर पेशा का हर जाति का हर वर्ग का आम आदमी आम किसान नरेंद्र मोदी पर विश्वास करता है। और चंद लोग जिनका हित एक ईमानदार व्यवस्था में नहीं सधता है, वे लोग हैं।
इस भारत बंद का समर्थन भारत की २२ पार्टियां ने किया। इसमें कांग्रेस पार्टी थी, इसमें आम आदमी पार्टी थी, इसमें शिवसेना थी, इसमें एन सी पी थी, इसमें समाजवादी पार्टी थी, इसमें बहुजन पार्टी थी, इसमें तृण्मूल कांग्रेस पार्टी थी, इसमें राजद थी, इसमें कॉमुनिस्ट पार्टी थी, इस तरह देश भर की कुल २३ पार्टियां इस बंद में शामिल हुयीं। मगर इस आंदोलन की हवा निकल गयी।
किसानों को नरेंद्र मोदी से आशा जगी है। उन्होंने भी जो कहा उसको डेलीवर किया है। देश को उनपर भरोसा है। इनके विरोधियों ने हमेशा यह कोशिश की की सरकार को चलने ही ना दें। सरकार आम लोगों के हित में कुछ कर ही ना सके। मगर हर बार अपोजीशन फेल हुयी है। इस बार भी यही हुआ।
कैसे तरक्की करेगा
दुनियां में कहीं भी
एग्रीकलचर स्टेट सपोर्ट के बगैर सरवाइव नही कर सका। अमेरिका और यूरोपीय यूनियन का
अपने किसानों को ६५ हजार डारल प्रति किसान सपोर्ट करते हैं कि आप किसान बन रहो। दुनियां
में कहीं भी किसान बहुत खुश नहीं है। मगर अनेक देश हैं जो किसानो को सपोर्ट करते हैं।
कैसे एक किसान परिवार को कम से कम १८००० रूपए उपलब्ध करा सकते हैं। कोरपोरेट का पीछले १४ सालों में ५५ लाख करोड़ रूपए का कर्ज माफ किया है। यह किसानो की ११० सालों की गरीबी मिटा सकते हैं। पैसा था।
अगर एमएसपी पर सारी खरीद करनी हो तो हर साल १.५ लाख करोड का खर्च आएगा।२००९ से अबतक कोरपोरेट को १ लाख ८६ हजार करोड का स्टीमूलस सलाना मिल रहा है। पैसा है।
सरकार किसानो के व्यापक में सुधार करना चाहती है
भारत में केंद्र की सरकार किसानो के लिए व्यापक देश हित में कुछ सुधार करना चाहती है। बहुत दिनों के बाद देश में एक प्रधान मंत्री आया है जिसको देश की जनता के प्रोबलेम की समझ है, उसके निवारण में वे देर नही लगाते। जो सत्तर सालों में नहीं हुआ वह सात सालों में दिख रहा है। फिरभी उसको सियासी कारणो से विरोध किया जाता है। इस विरोध में देश की २२ पार्टियां शामिल हैं। ये पार्टियां जानती हैं कि यह तो असल किसानों का आंदोलन नहीं है। यह आंदोलन किसानों का नहीं बल्कि दलालों का आंदोलन है। यह विचौलियों का आंदोलन है।
पहले कहा गया यह राजनैतिक
आंदोलन नहीं है। बाद में पाया गया कि यह २२ अपोजिशन का सम्मलित आंदोलन है। इस आंदोलन में कैनाडा का जस्टिन ट्रूडो भी है इगंलैंड
के एपी भी हैं। आप कह रहे है यह राजनैतिक आंदोलन
नहीं है। आप कह रहे हैं कि यह विशुद्ध किसान आंदोलन है मगर असली किसान अपने खेतों
में फसल निकालने में जुटा है। यह खलिस्तान आंदोलन
है। वे इस आंदोलन को किसान आंदोलन का रंग देना चाहते हैं।
किसान जो असली हैं वे खुश हैं।
आज व्यापारी उनके घर से अनाज उठाते हैं। बेहतर मूल्य देकर जाते हैं। वहीं मंडी की हालत बहुत खराब है। कई तरह के टैक्स लिए जाते थे। दस दस किलो अनाज तो सैम्पल लेने में वे ले लेते थे। मंडियों में किसान का बहत घाटा होता था। इसके अलावा वे कहते थे उघार माल छोड़कर जाओ और कल पैसे लेने आ जाना । महीनो बाद पैसा देते थे । उसमें बहुत घाटा था किसानो का।
मौजूदा कानून से किसान खुश हैं, दलाल परेशान
नये कानून से दलाल परेशान हैं। दिल्ली में वही लोग आंदोलन कर रहे हैं। किसान तो अपने मबेसियों के एक दिन के लिए भी छोड़कर बाहर जाने से बचता है। फिर ये दिल्ली में डेरा डालने वाले लोग किस किस्म के किसान हैं ?
नरेंद्र मोदी से पूर्व की सरकार का एक ही रवैया रहा है कि कुछ लोगों को खुश करने के लिए कानून बनाती थी और उसके कानून का विरोध करने वालों को खुश करने के लिए उनसे कहती थी कि हम उन कानूनों पर अमल नहीं करेंगे। इस तरह पूर्व की सरकारों ने सात दशक में जनता के हित में कुछ खास काम ही नहीं किया।
पंजाब में मंडी समीतियों का पूरा जाल बिछा है
पंजाब में मंडी समीतियों का पूरा जाल बिछा है। देश
के दूसरे राज्यों से किसान इसके समर्थन में हैं। क्या किसी एक राज्य के मांग पर
किसी केंद्रीय कानून को वापस लिया जा सकता है? बिलकुल नहीं लिया जाना चाहिए।
यह किसान का नहीं बल्कि पंजाब हरियाना और पश्चिमी यूपी के बिचौलियों और मंडी समीति चलानेवालों का आंदोलन है। पंजाब की मंडियों में किसानो के रेकार्ड ब्रेक घान की खरीद हुयी है। क्या वे बेचनेवाले किसान नहीं हैं? यह बिचौलियों के हित के लिए किसान विरोधी आंदोलन है।
पंजाब में ९८ फीसदी ऐसीयोर्ड इरीगेशन है
पंजाब में ९८ फीसदी ऐसीयोर्ड इरीगेशन है। हर खेत को पानी है। फिर भी तीन चार किसान रोज आत्म हत्या करते हैं। यहां २००० से २०१७ के बीच १६६०० किसानो ने आत्महत्या की।
इस आंदोलन में किसान नहीं है।
इस आंदोलन में किसान नहीं है। इसमें कोई कवि है, कोई पहलवान है, कोई गायक है, कोई खालिस्तानी है, कोई आइएसआइ एजेंट है, कोई आप पार्टी का नेता है, कोई कांग्रेस पार्टी का नेता है, कोई टीएमसी पार्टी का नेता है, कोई समाजवादी पार्टी का नेता है, कोई टीआरएस पार्टी का नेता है, कोई एनसीपी पार्टी का नेता है। मगर इसमें कोई किसान नहीं है। इसमें २२ पर्टियों के नेता हैं। इसमे योगेंद्र यादव हैं इसमें अरविंद केजरीवाल हैं इसमें राहुल प्रियंका भी हैं ममता दीदी भी हैं अखिलेश यादव भी हैं फिरभी यह राजनैतिक आंदोलन नहीं है।
१५ दिनों से यह किसान आंदोलन चल रहा है और इसकी वजह से राष्ट्रीय राजमार्ग बंधक बना हुआ है। इस आंदोलन में पूरी तरह से पोलिटिकल मोटिव है। वे किसानो के मुद्दे पर किसानों के विरुद्ध खड़े हैं। यह बात देश की जनता को समझ में आने लगी है। वे इस पर स्पष्ट प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
अब उनकी हताशा दिखई देती है। उनकी निराशा दिखई देती है। उनको अब लग गया है कि मुद्दा गलत पकड़ लिया। अब उन्हें लग गया कि इस किसान आंदोलन में किसान ही उनके साथ नहीं है।
जनता इस आंदोलन के साथ नहीं है
जनता इस आंदोलन के साथ नहीं है। किसान इस आंदोलन के साथ नहीं है। देश का आम किसान पंजाब के बड़े किसानों के साथ नहीं है। देश भर से प्रतिक्रिया में आवाज आना शुरु हो गया कि कुछ भी होगा कल भारत बंद नहीं होगा।
इन हरियाणा, पूर्वी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड आदि के भारतीय किसान यूनियन के नेता गण का अपना कोई आधार नहीं रह गया है। उनकी कुछ राजनैतिक ताकत भी नहीं हैं।
यह पूरा विपक्ष इस आंदोलन का समर्थन कर रहा था। दिल्ली की आप सरकार इस आंदोलन का समर्थन कर रहा था।
देश के आम किसान अब जागरुक हो गये हैं
देश के आम किसान अब जागरुक हो गये हैं। जनता समझती है। अब कोई उनको ब्लैकमेल नहीं कर सकता है।
पूरा विपक्ष एक साथ आ गया था कि इस अंदोलन को मिलकर हवा दें । मगर पूरा खेल ही उलट गया। देश के आम किसानों ने समझ लिए कि इसमें राजनीति हो रही है इसका किसान हित से कुछ लेना देना नहीं है।


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